Monday, September 10, 2018

मोदी के पक्ष में कैसे जुटा मीडिया?

जैसा अभूतपूर्व वह छविहनन अभियान था उतना ही वह जनसमर्थन रहा है जिसने मोदी को एक आंधी बना कर प्रधानमंत्री बना दिया. इसलिए यह कहना कि मोदी को मीडिया ने बनाया है मज़ाक है.
मीडिया के बड़े हिस्सों का मोदी के पक्ष में जुटना तब हुआ जब प्रचार अभियान के दौरान उनको मिल रहे ऐतिहासिक समर्थन और स्वीकार्यता की अप्रत्याशित लहर का एहसास होना शुरू हुआ.
वह लहर मोदी और शाह की रणनीति, चुनावी तैयारी, विराट संसाधनों और टेक्नोलॉजी के कभी न देखे गए इस्तेमाल और सबसे ज़्यादा मोदी की अपनी ऊर्जावान, मौलिक वक्तृता और नए सपने दिखाने की कला से पैदा हुई थी. मीडिया इस गाड़ी में बाद में सवार हुआ.
शिव कहते हैं, दो दशक पहले मोदी पूरी तरह एक अफ़वाह थे. यह अद्भुत स्थापना है. सच यह है कि दो दशक पहले वह भारतीय जनता पार्टी के एक कार्यकर्ता थे जो बाद में महासचिव बने.
उनका गुजरात जाना, मुख्यमंत्री बनना किसी सोची समझी योजना के तहत नहीं भाजपा और गुजरात के भीतर उस समय की परिस्थितियों ने अचानक संभव कर दिया. वह अफ़वाह नहीं कभी-कबार मीडिया में आने वाले एक पार्टी नेता थे, बस.
मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद गोधरा और गुजरात दंगों में मोदी की छवि मीडिया ने एक आइकन या आदर्श नहीं इसके बिलकुल उलट एक भयानक खलनायक की बनाई थी.
इस अभूतपूर्व रूप से नकारात्मक मीडिया छवि से लड़ कर, उसे हरा कर मोदी सत्ता के शिखर पर पहुंचे. मोदी मीडिया के खोजे और बनाए हुए नहीं थे तब, मीडिया के मारे हुए थे.
आज चार साल बाद स्थिति कुछ दृष्टियों से उलट गई लगती है. शिव को अभी सिर्फ़ वही दिख रही है.
जैसा ,मैं ऊपर कह चुका हूं, आज का सच सचमुच यह है कि तथाकथित राष्ट्रीय मीडिया का एक प्रभावशाली हिस्सा मोदी-महिमा में शामिल है. किन्तु एक हिस्सा, पूरा नहीं. यह हिस्सा अनालोचक हो गया है. पर यह कहना कि पूरा मीडिया ऐसा हो गया है, वैचारिक अतिवादिता है और अधूरी बात है.
शिव की शिकायतें जायज़ भी हैं. नोटबंदी पर मीडिया तथ्यपरक नहीं रहा कुछ को छोड़ कर. लेकिन उस समय लगभग पूरा देश, खासतौर पर मध्यम वर्ग और खुद मोदी तथा उनकी सरकार भी नोटबंदी की अच्छाईयों के सपनों से अभिभूत थे.
वह एक अत्यंत गंभीर गलती थी, मिसकैलकुलेशन था. पर सबको यह तो दिख रहा था कि मोदी ने एक भारी राजनीतिक जोखिम उठा कर यह कदम उठाया था. वह पूरी तरह नाकाम रहा, लेकिन इसने मोदी को बड़े, क्रांतिकारी किस्म के, देशहित में कड़े और अलोकप्रिय कदम उठाने की क्षमता वाले नेता के रूप में स्थापित किया. देश नीति में मोदी पर शिव की एक टिप्पणी गौरतलब है जो चकित करती है. मोदी के शिंजो आबे, पुतिन, ट्रंप के साथ दोस्ताना तस्वीरें खिंचवाने और इनसे लोगों को मोह लेने का आरोप लगाते समय शिव कहते हैं - मीडिया इन चार देशों के नैतिक खालीपन को देखना भूल जाता है.
क्या शिव जैसे गंभीर, वरिष्ठ चिंतक यह नहीं जानते कि असली राजनय में नैतिकता हमेशा, और हर देश के लिए, एक औपचारिकता के अलावा कुछ नहीं होती. उसपर देशहित का राजनय नहीं होता न हो सकता है.
विदेश मामलों में केवल देशहित सर्वोपरि होता है और यह देशहित नैतिक नहीं आर्थिक, सैनिक या रणनीतिक होता है।
लेकिन एक बात जो अपनी मीडिया आलोचना में शिव ने नहीं कही वह मैं कहना चाहता हूं. यह दुखद है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रेस कांफ्रेंस नहीं करते. चार साल में एक भी नहीं. मीडिया को दूर रखते हैं. यह गलत है.
उन्हें करनी चाहिए सभी लोकतांत्रिक प्रधानमंत्रियों, राष्ट्रपतियों की तरह. लेकिन अगर भारतीय मीडिया सचमुच उतना ही ठोस रूप से मोदी भक्त होता तो क्या मोदी उससे कतराते?

No comments:

Post a Comment