बीजेपी के इतिहास से पता चलता है कि इसके नेता ग़लत बयानबाजी करके बिना कोई हर्जाना दिए बच जाते हैं.
ये
बयान ऐसे नहीं होते हैं कि कभी किसी ने जोश में आकर कोई बयान दे दिया. ये
बयान उस विचारधारा से आते हैं जिसका पालन और प्रचार बीजेपी और आरएसएस करती
है.
ये कुछ ऐसा है कि भारतीय संविधान को मानना एक टोकनिज़्म की तरह है क्योंकि सत्ता में आने के लिए ऐसा करना ज़रूरी है लेकिन इस पार्टी के
असली सिद्धांत आरएसएस की विचारधारा पर आधारित हैं.
जब-जब संविधान और विचारधारा के बीच जंग होती है तो विचारधारा ही जीतती है.
अब भोपाल की सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर का महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के महिमामंडन को ही देखिए.
प्रज्ञा ने गोडसे को एक सच्चा देशभक्त बताया था.
इसके बाद बीजेपी के दो अन्य सांसद अनंत हेगड़े और नलिन कुमार कतील ने भी उनके बयान का समर्थन किया.
पूर्व केंद्रीय मंत्री हेगड़े ने कहा कि गोडसे-गांधी मुद्दे पर बहस होनी चाहिए.
वहीं,
कतील ने सवाल उठाया कि गोडसे ने एक व्यक्ति की हत्या की, अजमल कसाब ने 72
लोगों की और राजीव गांधी ने 1984 में 17 हज़ार सिखों की हत्या की, तो सबसे
ज़्यादा क्रूर कौन है?
मोदी ने लगभग इस बार की तरह ही कहा था कि वह
प्रज्ञा ठाकुर को दिल से कभी भी माफ़ नहीं कर पाएंगे. वहीं, शाह ने कहा कि बीजेपी की अनुशासन समिति दस दिनों में इस मसले पर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी.
ये
मामला 17 मई का है. इसके बाद प्रज्ञा ठाकुर भारी अंतर से चुनाव जीतकर सांसद बन चुकी हैं. वह लोकसभा जा रही हैं. ऐसे में वह जल्द ही लोकसभा में अपना पहला भाषण देंगी.
ऐसे में वो क्या बात है जिसकी वजह से हेगड़े को मंत्री मंडल में शामिल नहीं किया गया.
वह बीजेपी के उन नेताओं में शामिल हैं जिनके कंधे पर चढ़कर बीजेपी कर्नाटक के अगले विधानसभा चुनाव में उतरने जा रही है.
लिंचिंग और दंगों के रिकॉर्ड पर नज़र डालें तो तत्काल 'न्याय' करने वाले नेता हमेशा बीजेपी में एक मुकाम हासिल करते हैं.
मुज़्ज़फ़रनगर
दंगों में अभियुक्त बनाए जाने वाले सुरेश राणा इस समय यूपी कैबिनेट में मंत्री हैं. वहीं, दूसरे अभियुक्त संगीत सोम एक विधायक हैं.
ऐसे में इस बात की संभावना जताई जा सकती है कि बीजेपी में आकाश विजयवर्गीय का भविष्य बहुत अच्छा है.
Wednesday, July 3, 2019
Wednesday, June 19, 2019
中国在海外为什么要“绿色”投资
在4月下旬举办的“一带一路”高峰论坛上,国家开发银行签署了“一带一路”绿色投资原则。该原则于去年发布,是一套自愿准则,目的是促进“一带一路”倡议之下的低碳、可持续投资。
作为世界上最大的开发银行,也是“一带一路”项目的主要融资机构,国家开发银行此举意义非凡。但与其他开发银行不同的是,国家开发银行仍在为海外煤炭项目提供融资(超过18千兆瓦的煤炭产能仍在建设中),并且目前尚未公布气候战略。
国家开发银行在煤炭问题上的立场不符合中国的经济利益和不断变化的国际规范。国开行应迅速转向可持续投资,利用全球清洁能源市场,避免气候风险加剧,在气候问题上表现出一致性和领导力。
全球清洁能源机会
通过提高海外绿色融资,中国既可以应对气候变化,也可以支持其制造业。2014年,清洁能源制造业为中国经济带来近400亿美元的收入,全球太阳能发电的价格也因此而大幅降低。有估计称,从成本优势的角度来讲,中国太阳能发电的成本比美国低20% 。中国在能源效率方面也处于领先地位。近来一项研究估计,全球可再生能源市场有机会给中国带来1万亿美元的收入。如果中国继续投资海外煤电厂,其在这方面的优势将受到影响。
经济学更倾向清洁能源
中国仍是全球煤炭项目最大的融资方。但事实上,全球近40%煤电厂的营收情况都不佳,而且到2040年这一比例可能会上升至75%。这意味着国开行支持的煤炭项目可能会沦为无法获得经济回报的搁浅资产。最近的研究发现,这些损失可能导致严重的金融困境,进而影响宏观经济和金融稳定。
过去之所以会优先考虑投资海外煤炭项目,一个原因就是为了吸纳国内煤炭行业过剩的产能。但中国不是煤炭的主要出口国,2017年排在全球第10位,2016年中国煤炭产量下降7.9%,创历史新低。建立煤炭出口所需的投资其实可以更好地投资于一些转型项目,创造可持续就业。
国开行的投资对象从煤炭转向清洁能源将促进中国自身经济的发展。中国可再生能源领域的就业岗位已经超过了煤炭开采业,且呈上升趋势,从2016年的360万增至2017年的390万。继续为煤炭出口提供融资,可能会延长煤炭行业逐渐衰落的过程,而这些资金本可以更好地用于增加清洁能源就业岗位。国家开发银行可以通过从煤炭向清洁能源的战略转变,促进国内长期就业岗位的增加。
气候风险
如果国家开发银行继续投资海外煤炭项目,全球气候政策失败,那国内受气候变化的影响将很严重。中国气候变化专家委员会提出了4种气候风险:冰川融化引发水资源风险;海平面上升和洪水带来的城市安全风险;气候引发的贫困风险;和对疾病的影响。
中国的中期增长取决于“一带一路”国家是否走上可持续发展的道路,所以没有理由让这些国家的经济中存在这种脆弱性。“一带一路”有让这些经济体朝着好的方向转型的能力,但也可能导致全球陷入灾难性的气候变化,让巴黎气候目标变得遥不可及。
中国领导力与国际规范
各大开发银行正在放弃煤炭投资,新的绿色投资原则也是国家开发银行的一个机会。国开行可以借鉴其他机构的经验,在应对气候变化方面确立自己全球领先金融机构的地位。
清洁能源投资如今成为金融行业新的规范。目前全球超过100家主要金融机构都在限制煤炭融资,银行和贷款机构平均每两周就会宣布一项新政策。作为国际开发性金融俱乐部的一员,国开行已经承诺遵守《巴黎协定》,并有机会展示中国的气候领导力。
最后,国家开发银行作为中国对外投资的大使,应该支持更好的发展选择。一些国家选错了投资领域,可能难以抵挡煤炭融资的诱惑,但帮助他们转向清洁能源,并在这个过程中分享自己在该领域的专业知识,这才是符合中国利益的。
作为世界上最大的开发银行,也是“一带一路”项目的主要融资机构,国家开发银行此举意义非凡。但与其他开发银行不同的是,国家开发银行仍在为海外煤炭项目提供融资(超过18千兆瓦的煤炭产能仍在建设中),并且目前尚未公布气候战略。
国家开发银行在煤炭问题上的立场不符合中国的经济利益和不断变化的国际规范。国开行应迅速转向可持续投资,利用全球清洁能源市场,避免气候风险加剧,在气候问题上表现出一致性和领导力。
全球清洁能源机会
通过提高海外绿色融资,中国既可以应对气候变化,也可以支持其制造业。2014年,清洁能源制造业为中国经济带来近400亿美元的收入,全球太阳能发电的价格也因此而大幅降低。有估计称,从成本优势的角度来讲,中国太阳能发电的成本比美国低20% 。中国在能源效率方面也处于领先地位。近来一项研究估计,全球可再生能源市场有机会给中国带来1万亿美元的收入。如果中国继续投资海外煤电厂,其在这方面的优势将受到影响。
经济学更倾向清洁能源
中国仍是全球煤炭项目最大的融资方。但事实上,全球近40%煤电厂的营收情况都不佳,而且到2040年这一比例可能会上升至75%。这意味着国开行支持的煤炭项目可能会沦为无法获得经济回报的搁浅资产。最近的研究发现,这些损失可能导致严重的金融困境,进而影响宏观经济和金融稳定。
过去之所以会优先考虑投资海外煤炭项目,一个原因就是为了吸纳国内煤炭行业过剩的产能。但中国不是煤炭的主要出口国,2017年排在全球第10位,2016年中国煤炭产量下降7.9%,创历史新低。建立煤炭出口所需的投资其实可以更好地投资于一些转型项目,创造可持续就业。
国开行的投资对象从煤炭转向清洁能源将促进中国自身经济的发展。中国可再生能源领域的就业岗位已经超过了煤炭开采业,且呈上升趋势,从2016年的360万增至2017年的390万。继续为煤炭出口提供融资,可能会延长煤炭行业逐渐衰落的过程,而这些资金本可以更好地用于增加清洁能源就业岗位。国家开发银行可以通过从煤炭向清洁能源的战略转变,促进国内长期就业岗位的增加。
气候风险
如果国家开发银行继续投资海外煤炭项目,全球气候政策失败,那国内受气候变化的影响将很严重。中国气候变化专家委员会提出了4种气候风险:冰川融化引发水资源风险;海平面上升和洪水带来的城市安全风险;气候引发的贫困风险;和对疾病的影响。
中国的中期增长取决于“一带一路”国家是否走上可持续发展的道路,所以没有理由让这些国家的经济中存在这种脆弱性。“一带一路”有让这些经济体朝着好的方向转型的能力,但也可能导致全球陷入灾难性的气候变化,让巴黎气候目标变得遥不可及。
中国领导力与国际规范
各大开发银行正在放弃煤炭投资,新的绿色投资原则也是国家开发银行的一个机会。国开行可以借鉴其他机构的经验,在应对气候变化方面确立自己全球领先金融机构的地位。
清洁能源投资如今成为金融行业新的规范。目前全球超过100家主要金融机构都在限制煤炭融资,银行和贷款机构平均每两周就会宣布一项新政策。作为国际开发性金融俱乐部的一员,国开行已经承诺遵守《巴黎协定》,并有机会展示中国的气候领导力。
最后,国家开发银行作为中国对外投资的大使,应该支持更好的发展选择。一些国家选错了投资领域,可能难以抵挡煤炭融资的诱惑,但帮助他们转向清洁能源,并在这个过程中分享自己在该领域的专业知识,这才是符合中国利益的。
Sunday, May 26, 2019
इमरान ख़ान की नरेंद्र मोदी से सीधी बात, क्या मिलेगा शपथग्रहण समारोह का न्यौता
14 फ़रवरी को भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में सुरक्षाबलों पर चरमपंथी हमले और उसके बाद भारतीय वायु सेना
द्वारा बालाकोट में की गई एयरस्ट्राइक के बाद पहली बार भारतीय और पाकिस्तानी प्रधानमंत्रियों के बीच रविवार को सीधी बातचीत हुई.
भारतीय
और पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा है कि रविवार को
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टेलिफ़ोन कॉल करके लोकसभा चुनावों में उन्हें जीत की बधाई दी.भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से क्षेत्रीय शांति और विकास के लिए आतंकवाद की समाप्ति के लिए लड़ने पर ज़ोर दिया.
बयान के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हमारे क्षेत्र में शांति, प्रगति और समृद्धि के लिए भरोसे, हिंसा और आतंकवाद से मुक्त वातावरण बनाना आवश्यक है."
वहीं, पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि टेलिफ़ोन कॉल के दौरान इमरान ख़ान ने भारतीय प्रधानमंत्री से दक्षिण एशिया में शांति, विकास और आपसी सहयोग के अपने वादे को दोहराया.
पुलवामा हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के संबंध बेहद तनावपूर्ण हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दूसरी बार लोकसभा चुनावों में जीत दर्ज की है जबकि 2014 में चुनाव जीतने के बाद अपने शपथ ग्रहण समारोह में उन्होंने दक्षिण एशियाई देशों के राष्ट्र प्रमुखों को आमंत्रित किया था.
इस शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ भी शामिल थे. इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शपथ ग्रहण समारोह 30 मई को है.
वह इस बार किन देशों के राष्ट्र प्रमुखों को शपथ ग्रहण समारोह में बुलाएंगे यह अभी तक साफ़ नहीं है.
भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में यह भी बताया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इमरान ख़ान के अलावा मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति और नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री ने भी टेलीफ़ोन कॉल करके बधाई दी.
मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने प्रधानमंत्री मोदी को उनकी ऐतिहासिक जीत पर बधाई देते हुए क्षेत्र में कट्टरपंथ और चरमपंथ से साथ लड़ने की महत्ता पर बल दिया. इसके जवाब में प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें धन्यवाद देते हुए क्षेत्र में विकास, सुरक्षा और शांति पर साथ काम करने का भरोसा दिलाया.
वहीं, नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल ने भी प्रधानमंत्री मोदी को बधाई दी. उन्होंने कहा कि विश्व शक्ति के रूप में भारत का उदय पूरे क्षेत्र का उत्थान करेगा.
Friday, May 3, 2019
هل يقبل الجيش في الجزائر والسودان تسليم الحكم لسلطة مدنية؟
لا يزال مصير الحراكين الشعبيين ضد النظامين القائمين في كل من الخرطوم
والجزائر في حكم المجهول. فرغم مرور أكثر من أربعة أشهر على اندلاع
المظاهرات في السودان، وبعد أكثر من شهرين على نظيرتها في الجزائر لا تبدو
بوادر انتقال سياسي سلس نحو حكم مدني في الأفق.
ففي السودان وصلت المفاوضات بين قوى الحرية والتغيير، التي انبثقت عن حراك الشارع، وأعضاء المجلس العسكري، الذي يدير دفة الحكم في البلاد، الى ما يشبه الطريق المسدود، بسبب خلاف الجانبين حول طبيعة وشكل هياكل السلطة الانتقالية.
ففيما تطالب قوى الحرية والتغيير بمجلس انتقالي من خمسة عشر عضوا يشكل العنصر المدني الأغلبية فيه، يرفض المجلس العسكري هذا الاقتراح جملة وتفصيلا ويعرض مجلسا من عشرة أعضاء تقتصر مشاركة المدنيين فيه على ثلاثة أعضاء فقط..
ويرى المجلس العسكري أن مطالب قوى الحرية والتغيير بكامل السيطرة على مجلس الوزراء والبرلمان، وبجزء من مجلس السيادة، غير مقبولة على الإطلاق.
وإثر خروج هذا الخلاف إلى العلن بدا أن مواقف الطرفين بدأت تنحو نحو التصعيد بإعلان الفريق محمد حمدان - نائب رئيس المجلس العسكري الانتقالي- عدم السماح بما وصفه بالفوضى وحالة الانفلات الأمني. وقال في مؤتمر صحفي: "لن نقبل بأي فوضى أو اعتداء على المواطنين أو ممتلكاتهم أو مقدرات الدولة" وأضاف: "سوف يتم التعامل بالحزم اللازم وفق القانون." ومع ذلك شدد أعضاء المجلس العسكري على أن باب الحوار سيظل مفتوحا امام ممثلي المحتجين.
أمام رفض العسكر لمقترحاته، تعهد تحالف قوى الحرية والتغيير بالعودة الى طاولة التفاوض بمقترحات جديدة، محتفظا في الوقت ذاته بضغوطه على المؤسسة العسكرية من خلال الدعوة إلى مظاهرات مليونية في ساحة الاعتصام في الخرطوم.
وإذا كان الحوار بين الجيش وممثلي المحتجين في السودان قد قطع أشواطا - تبعث على التفاؤل نوعا ما وإن لم تسفر عن نتائج تذكر حتى اليوم - فإن الوضع في الجزائر أكثر تعقيدا حيث لا وجود لأي حوار، على الأقل في العلن، أو قناة اتصال بين حراك الشارع والمؤسسة العسكرية التي تدير دفة الحكم في البلاد، بواجهة مدنية ممثلة في الرئيس الانتقالي عبد القادر بن صالح.
فلا المتظاهرون اختاروا أو أعلنوا عمن يمثلهم ولا المؤسسة العسكرية، التي لا تريد الخروج عن النص الدستوري في إدارة هذه الأزمة، دعت بعضهم إلى الحوار.
وحتى لو تأكد وجود نية حقيقية لدى المؤسسة العسكرية الحالية في الجزائر، بقيادة الفريق أحمد قايد صالح، للتجاوب مع مطالب الشارع وإقامة نظام سياسي جديد في البلاد، فإن هذه الرغبة تصطدم بعدم وجود طرف مقابل يرضى عنه الشارع، يمكن أن يفتح حوارا مع الجيش ويبحث معه حلولا وسط تحافظ على هياكل الدولة وتعبر بالبلاد إلى بر الأمان.
وتكمن المشكلة هنا في أن الحراك الشعبي، الذي يقود المظاهرات منذ شهر فبراير الماضي، لم يتمكن من إنجاب أي قيادة تتحدث باسمه. فهذا حراك نبع بشكل عفوي من الشارع وحدد مطالب أولية وظل يضيف إليها أخرى جديدة بمرور الأيام والأسابيع.
ورغم أن الحراك الشعبي في الجزائر يفتقر إلى قيادة سياسية، فإن جماهيره تجمع على القطع مع كل الأحزاب السياسية والنقابات التقليدية - الموالية والمعارضة - وترفض انضمامها لحراكه ومظاهراته أو الحديث باسمه.
ورغم الضغوط الشعبية الكبيرة التي تواجهها المؤسسة العسكرية في الجزائر فإنها لا تزال متماسكة، بقيادة رئيس الأركان ونائب وزير الدفاع الفريق قايد صالح، الذي تتقلب تصريحاته منذ اندلاع المظاهرة، قبل حوالي 10 أسابيع، بين دعم مطالب الحراك تارة والتعبير عن قرب نفاذ صبره منها تارة أخرى. وعلى عكس الوضع في السودان لا تبدو في الأفق بوادر حل قريب في الجزائر.
ويلخص الوضع الحالي في كل من الجزائر والسودان أزمة تدخل الجيش في الحياة السياسية في بعض أنظمة الدول العربية وعلاقته بمؤسسة الحكم والرئاسة. فبالرغم من نجاح الحراكين في الإطاحة برأسي النظامين في العاصمتين فإن المرور الى مرحلة انتقالية وفق رؤية الشارعين تواجه صعوبات.
وتتراوح هذه الصعوبات بين تمسك المؤسسة العسكرية بتلابيب الحكم والسلطة وبين مخاوفها من حدوث فراغ سياسي يؤدي الى انهيار هياكل الدولة ووصول تيارات سياسية قبلية أو طائفية أو دينية الى السلطة لا تملك قوة التحكم في أطراف بلد مترامي الأطراف. وقد يجر تغيير النظام السياسي الحالي إلى آخر ديمقراطي على الجيش شر محاسبة عناصره - باسم العدالة - على ما مضى من تجاوزات الحكم السابق.
ولربما كان تدخل أطراف أجنبية عربية وغربية في حراك البلدين في محاولة لإعادة إنتاج نظامين سياسيين مواليين لها عاملا إضافياً يؤخر الحل في العاصمتين.
برأيكم:
هل يقبل الجيش في الجزائر والسودان تسليم الحكم لسلطة مدنية؟
هل لمست نية حقيقية للمجلس العسكري في التخلي عن الحكم للمدنيين في السودان؟
هل تتفقون مع من يتهم قوى الإصلاح والتغيير في السودان بالمبالغة في مطالبها؟
لماذا تأخر الحوار بين المحتجين والمؤسسة العسكرية في الجزائر؟ هل يريد الجيش فعلا فتح حوار مع الحراك؟
هل تشكل التدخلات الخارجية خطرا فعليا على الحراك في البلدين؟
سنناقش معكم هذه المحاور وغيرها في حلقة الجمعة 3 أيار/مايو من برنامج نقطة حوار الساعة 16:06 جرينتش.
ففي السودان وصلت المفاوضات بين قوى الحرية والتغيير، التي انبثقت عن حراك الشارع، وأعضاء المجلس العسكري، الذي يدير دفة الحكم في البلاد، الى ما يشبه الطريق المسدود، بسبب خلاف الجانبين حول طبيعة وشكل هياكل السلطة الانتقالية.
ففيما تطالب قوى الحرية والتغيير بمجلس انتقالي من خمسة عشر عضوا يشكل العنصر المدني الأغلبية فيه، يرفض المجلس العسكري هذا الاقتراح جملة وتفصيلا ويعرض مجلسا من عشرة أعضاء تقتصر مشاركة المدنيين فيه على ثلاثة أعضاء فقط..
ويرى المجلس العسكري أن مطالب قوى الحرية والتغيير بكامل السيطرة على مجلس الوزراء والبرلمان، وبجزء من مجلس السيادة، غير مقبولة على الإطلاق.
وإثر خروج هذا الخلاف إلى العلن بدا أن مواقف الطرفين بدأت تنحو نحو التصعيد بإعلان الفريق محمد حمدان - نائب رئيس المجلس العسكري الانتقالي- عدم السماح بما وصفه بالفوضى وحالة الانفلات الأمني. وقال في مؤتمر صحفي: "لن نقبل بأي فوضى أو اعتداء على المواطنين أو ممتلكاتهم أو مقدرات الدولة" وأضاف: "سوف يتم التعامل بالحزم اللازم وفق القانون." ومع ذلك شدد أعضاء المجلس العسكري على أن باب الحوار سيظل مفتوحا امام ممثلي المحتجين.
أمام رفض العسكر لمقترحاته، تعهد تحالف قوى الحرية والتغيير بالعودة الى طاولة التفاوض بمقترحات جديدة، محتفظا في الوقت ذاته بضغوطه على المؤسسة العسكرية من خلال الدعوة إلى مظاهرات مليونية في ساحة الاعتصام في الخرطوم.
وإذا كان الحوار بين الجيش وممثلي المحتجين في السودان قد قطع أشواطا - تبعث على التفاؤل نوعا ما وإن لم تسفر عن نتائج تذكر حتى اليوم - فإن الوضع في الجزائر أكثر تعقيدا حيث لا وجود لأي حوار، على الأقل في العلن، أو قناة اتصال بين حراك الشارع والمؤسسة العسكرية التي تدير دفة الحكم في البلاد، بواجهة مدنية ممثلة في الرئيس الانتقالي عبد القادر بن صالح.
فلا المتظاهرون اختاروا أو أعلنوا عمن يمثلهم ولا المؤسسة العسكرية، التي لا تريد الخروج عن النص الدستوري في إدارة هذه الأزمة، دعت بعضهم إلى الحوار.
وحتى لو تأكد وجود نية حقيقية لدى المؤسسة العسكرية الحالية في الجزائر، بقيادة الفريق أحمد قايد صالح، للتجاوب مع مطالب الشارع وإقامة نظام سياسي جديد في البلاد، فإن هذه الرغبة تصطدم بعدم وجود طرف مقابل يرضى عنه الشارع، يمكن أن يفتح حوارا مع الجيش ويبحث معه حلولا وسط تحافظ على هياكل الدولة وتعبر بالبلاد إلى بر الأمان.
وتكمن المشكلة هنا في أن الحراك الشعبي، الذي يقود المظاهرات منذ شهر فبراير الماضي، لم يتمكن من إنجاب أي قيادة تتحدث باسمه. فهذا حراك نبع بشكل عفوي من الشارع وحدد مطالب أولية وظل يضيف إليها أخرى جديدة بمرور الأيام والأسابيع.
ورغم أن الحراك الشعبي في الجزائر يفتقر إلى قيادة سياسية، فإن جماهيره تجمع على القطع مع كل الأحزاب السياسية والنقابات التقليدية - الموالية والمعارضة - وترفض انضمامها لحراكه ومظاهراته أو الحديث باسمه.
ورغم الضغوط الشعبية الكبيرة التي تواجهها المؤسسة العسكرية في الجزائر فإنها لا تزال متماسكة، بقيادة رئيس الأركان ونائب وزير الدفاع الفريق قايد صالح، الذي تتقلب تصريحاته منذ اندلاع المظاهرة، قبل حوالي 10 أسابيع، بين دعم مطالب الحراك تارة والتعبير عن قرب نفاذ صبره منها تارة أخرى. وعلى عكس الوضع في السودان لا تبدو في الأفق بوادر حل قريب في الجزائر.
ويلخص الوضع الحالي في كل من الجزائر والسودان أزمة تدخل الجيش في الحياة السياسية في بعض أنظمة الدول العربية وعلاقته بمؤسسة الحكم والرئاسة. فبالرغم من نجاح الحراكين في الإطاحة برأسي النظامين في العاصمتين فإن المرور الى مرحلة انتقالية وفق رؤية الشارعين تواجه صعوبات.
وتتراوح هذه الصعوبات بين تمسك المؤسسة العسكرية بتلابيب الحكم والسلطة وبين مخاوفها من حدوث فراغ سياسي يؤدي الى انهيار هياكل الدولة ووصول تيارات سياسية قبلية أو طائفية أو دينية الى السلطة لا تملك قوة التحكم في أطراف بلد مترامي الأطراف. وقد يجر تغيير النظام السياسي الحالي إلى آخر ديمقراطي على الجيش شر محاسبة عناصره - باسم العدالة - على ما مضى من تجاوزات الحكم السابق.
ولربما كان تدخل أطراف أجنبية عربية وغربية في حراك البلدين في محاولة لإعادة إنتاج نظامين سياسيين مواليين لها عاملا إضافياً يؤخر الحل في العاصمتين.
برأيكم:
هل يقبل الجيش في الجزائر والسودان تسليم الحكم لسلطة مدنية؟
هل لمست نية حقيقية للمجلس العسكري في التخلي عن الحكم للمدنيين في السودان؟
هل تتفقون مع من يتهم قوى الإصلاح والتغيير في السودان بالمبالغة في مطالبها؟
لماذا تأخر الحوار بين المحتجين والمؤسسة العسكرية في الجزائر؟ هل يريد الجيش فعلا فتح حوار مع الحراك؟
هل تشكل التدخلات الخارجية خطرا فعليا على الحراك في البلدين؟
سنناقش معكم هذه المحاور وغيرها في حلقة الجمعة 3 أيار/مايو من برنامج نقطة حوار الساعة 16:06 جرينتش.
Thursday, March 28, 2019
الإندبندنت: لبنان يحذر أوروبا من موجة جديدة من المهاجرين السوريين
نشرت الإندبندنت أونلاين مقالا لريتشارد هول مراسلها في منطقة الشرق الأوسط يتناول فيه
تحذيرات لبنانية لدول الاتحاد الأوروبي من مخاطر حدوث موجة ثانية من نزوح
المهاجرين السوريين.
ويوضح هول أن الحكومة اللبنانية بنت هذا التحذير على أساس عدم تحسن الاقتصاد اللبناني خلال السنوات القليلة
المقبلة حيث أن الدولة الصغيرة تستضيف ما يقرب من مليون ونصف مهاجر سوري
وهو أعلى معدل من المهاجرين في أي دولة في العالم بالنسبة إلى تعداد
السكان.وينقل هول عن الرئيس اللبناني ميشيل عون قوله إن "أمواجا" من المهاجرين السوريين قد تتجه من جديد نحو أوروبا.
ويوضح هول أن المجتمع اللبناني انقسم بشكل حاد حول قضية وجود المهاجرين السوريين بما يعكس الانقسام حول ملف الحرب السورية من الأساس تخوفا من أن ينعكس وجود المهاجرين السوريين تدريجيا على الوضع السياسي الثابت في لبنان من حيث تقاسم السلطة السياسية بين الفصائل المختلفة.
ويعتبر هول أن أزمة المهاجرين السوريين ألقت بظل ثقيل على الوضع الاقتصادي في لبنان حيث تزايدت معدلات البطالة خاصة بين الشباب وارتفعت معدلات التضخم مما دفع مؤسسات اقتصادية كبرى مثل مؤسسة موديز إلى تخفيض التصنيف الائتماني للبلاد.
الفاينانشيال تايمز نشر تقريرا موسعا عن التطورات الجارية في الاقتصاد في القارة الأفريقية بالتعاون مع الصين.
وتوضح الجريدة أن المشروعات الضخمة التي تمولها الصين في مجال البنية التحتية في العديد من الدول الأفريقية جذبت انتباه العالم بأسره لكن هناك الآلاف من رجال الأعمال والتجار الصغار الصينيين الذين يعملون في مجالات مختلفة في أفريقيا لمعاونة الصين على تحقيق الهدف المنشود.
وتقدر الجريدة حجم الصينيين الذين نزحوا إلى أفريقيا للاستثمار أو العمل فيها بنحو مليون شخص تطلعوا إلى القارة ووجدوا فيها مصدرا لثروتهم المرجوة مضيفة أن هؤلاء شجعتهم الحكومة الصينية أو دفعتهم إلى اتخاذ هذه الخطوة عبر القوانين الاقتصادية التي تنظم العمل في المشروعات الصغيرة والمتوسطة في البلاد والحوافز التي تقدمها للاستثمار في أفريقيا.
وتوضح الجريدة أن هناك 10 آلاف مشروع استثماري صيني في القارة الأفريقية بينها 920 مشروعا في نيجيريا و861 مشروعا آخر في مالاوي ويقدر حجم العائد الاقتصادي لهذه المشروعات بمليارات الدولارات كما ان نحو 89 في المائة من العاملين في هذه المشروعات الصينية من المواطنين الأفارقة.
وتقول الجريدة إن المشروعات الصينية تواجه رغم ذلك العديد من العقبات منها على سبيل المثال الحاجة إلى استيراد الكثير من المواد من الخارج قبل إعادة تصنيعها وهو ما يجبرهم على التعامل في أسواق العملات العالمية كما أنهم يخضعون لمعوقات حكومية و من قبل مظفي الجمارك والموانيء في أغلب الدول الأفريقية.
الغارديان نشرت تقريرا لجنيفير رانكين في بروكسل و لورينزو توندة في باليرمو في إيطاليا يتناول ملف مزاعم باختطاف مهاجرين لمركب أنقذتهم.
وتوضح الجريدة أن السفينة التجارية إليبلو1 أنقذت عشرات المهاجرين غير القانونيين وطالبي اللجوء في البحر الأبيض المتوسط قرب السواحل الليبية لكنهم انقلبوا على الطاقم وقاموا باختطاف السفينة بعدما تأكدوا من أنها عائدة إلى الأراضي الليبية.
وتشير الجريدة إلى أن وسائل الإعلام الإيطالية أكدت أن السفينة حاليا في طريقها إلى سواحل مالطا وهو الأمر الذي أكده نائب رئيس الوزراء الإيطالي و السلطات المالطية كذلك.
وتقول الجريدة إن إيطاليا ومالطا تنظران إلى المهاجرين الآن على أنهم قراصنة حسب التعبير الذي استخدمه ماتيو سالفيني وزير الداخلية الإيطالي الذي أكد أن موانيء بلاده لن تستقبل السفينة وهو نفس الموقف الذي تبنته الحكومة المالطية حسب التصريحات التي أدلى بها قادة القوات المسلحة.
و توضح الجريدة أن الاتحاد الأوروبي قرر إيقاف العملية صوفيا وهي الدوريات البحرية التي كانت تجوب مياه البحر المتوسط وتساعد في إنقاذ المهاجرين والتي أنقذت آلاف المهاجرين من الغرق خلال الأعوام الماضية.
وتقول الجريدة إن إيطاليا هددت باستخدام حق النقض (الفيتو) في اجتماعات الاتحاد الأوروبي لوقف العملية التي بدأت في العام 2015 باستخدام سفينتين وخمس طائرات ومروحيات لمسح البحر الأبيض المتوسط وإنقاذ المهاجرين.
Thursday, February 21, 2019
وفاة مصمم أزياء دار "شانيل" الشهير، كارل لاغرفيلد
توفي مصمم الأزياء الشهير كارل لاغرفيلد في باريس بعد فترة قصيره من إصابته بالمرض.
كان المصمم الألماني، المدير الإبداعي لشانيل وفندي، واحدًا من أكثر الشخصيات
إنتاجًا في مجال تصميم الازياء والموضة، وعمل حتى وفاته.وقد جعلته تسريحة شعرة المعروفة بـ "بوني تيل" ونظاراته السوداء وقمصانه البيضاء ذات الياقة العالية، شخصية معروفة في جميع أنحاء العالم.
وقد نعته كبرى شركات الموضة العالمية، بما في ذلك المصمم الإيطالي دوناتيلا فيرساتشي.
وقالت رئيسة تحرير مجلة فوغ، آنا وينتور، "اليوم فقد العالم عملاقا بين الرجال".
وكانت شائعات تدهور صحة لاغرفيلد قد انتشرت لعدة أسابيع بعد أن غاب عن عدد من أحداث عرض الأزياء، بما في ذلك عرض شانيل، لجديد أزياء الربيع والصيف، الشهر الماضي.
وتوفي لاغرفيلد صباح الثلاثاء بعد دخوله المستشفى في الليلة السابقة، بحسب وسائل الإعلام الفرنسية.
وقد لقب مشاهير الموضة، لاغرفيلد، الألماني الذي توفي عن عمر يناهز 85 عاماً ، بالإمبراطور أو "القيصر".
وكان لاغرفيلد واحدا من مصممي الأزياء الأكثر شهرة في العالم، في ثلاثة من دور الموضة العالمية.
فقد قاد شانيل لأكثر من 30 عامًا ، مزج فيها الذوق الفني بالفطنة التجارية، وأوصل مبيعات العلامة الباريسية إلى 10 مليار دولار في عام 2017.
لكن علامته التجارية لاغرفيلد وصلت إلى أبعد من كونها مشروعه التجاري حيث شملت كل جانب من جوانب حياته.
وقد عرف عنه عبارته المشهورة "كل من يرتدي سروالً للركض فقد السيطرة على حياته".
وقال لـ عام 2011: "أنا علامة تجارية تمشي بين الناس".
كان تاريخ ميلاد لاغرفيلد مسألة خلافية لبعض الوقت. فموقع لاغرفيلد الإلكتروني يقول إنه ولد عام 1938 ، على الرغم من أن الكثيرين يقولون إنه أكبر بخمس سنوات.
ولد في هامبورغ لأم ألمانية وأب سويدي، يدعى أوتو ، اشتهر باستيراد الحليب المكثف.
انتقل مع والديه بعد بضع سنوات إلى مدينة باد برمستيدت، و قضى فيها سنوات الحرب.
ولم ينوي لاغرفيلد الشاب البقاء في بلدته التي ولد فيها، بعد أن كان مغرما بتصميم الأزياء - حيث شعر بأنه قد يكون ذا مستقبل واعد وبأن الأقدار تخبئ له الشيء الكثير.
قال لاغرفيلد للإعلام الألماني "كطفل ، وشاب صغير ، كان لدي شعور بأنه لا يهم ما تفعله ما دمت مقتنعا به! " ظننت أنني كنت أضيع عمري - أهدره في ألمانيا ما بعد تلك الحرب الكئيبة".
انتقل لاجرفيلد في سن المراهقة إلى باريس عام 1952 بعد أن شاهد عرض أزياء ديور في مدينة هامبورغ.
وجاءت بداية شهرته عام 1954 ، عندما فاز بالجائزة الأولى لرسم مخطط لمعطف، ليصممه بعد ذلك المصمم بيير بالمين. الذي أعجب بالتصميم وعرض عليه وظيفة مساعد له.
بعد ثلاث سنوات فقط ، تم تعيينه مديرا فنيا لجان باتو.
و في عام 1965، وبعد فترة قصيرة من عمله لدار كلوي، بدأ تعاونًا استمر حتى نهاية حياته ، مع دار الأزياء الإيطالية فندي.
ولكن عمله كمدير فني في شانيل منذ بداية عام 1983 ، كان هو الذي دفعه إلى دائرة الضوء وجعل منه رمز الموضة المعروفة خلال العقود الثلاثة المقبلة.
على الرغم من اعترافه أن مؤسس العلامة التجارية شانيل لم يكن مبتهجًا بالاتجاه الذي أخذ فيه العلامة. وقال "ما أقوم به سيجعل كوكو يكرهني."
ورغم كل ذلك فإنه لم يتربع على عرش الموضة إلا عقب إنشاء علامته التجارية الخاصة ، كارل لاغرفيلد.
ولم يكن راضيا عن تصميم الملابس البسيطة، فبدا حملة تصوير جميع تصاميمه سنة 1987.
وشهد مطلع القرن الماضي دخول لاغرفيلد سوقًا جديدة، صناعة الحمية الغذائية. فقد تخلص من حوالي 43 كيلوغراما من وزنه وحوّل خبرته إلى كتاب بعنوان "الحمية الثلاثية الأبعاد" ، والذي يتوقع ان تباع الأف النسخ منه.
وقال في مقابلة للتلغراف عام 2004 "أردت فجأة أن أرتدي ملابس مصممة من قبل هادي سليمان ، الذي كان يعمل في سان لوران ويصمم الآن مجموعات ديور هوم".
و أصبح في ذلك العام، أول مصمم أزياء يتعاون مع شركة اتش أند ام المعروفة.
تبع ذلك المزيد من التعاون - حيث صمم ثلاث زجاجات مختلفة لشركة كوكاكولا، لشرابه المفضل دايت كوكاكولا.
وكان لإطلاق هذا المشروع عام 2011 شأنا كبيرا بإعلانه المعروف" الشاب الذي يمسك قنينة المشروب الغازي على طبق من فضة"
Thursday, January 17, 2019
تونس في ذكرى الثورة: ما هي الانجازات؟ وماهي الإخفاقات؟
بينما يحتفل التونسيون بالذكرى الثامنة لثورتهم التي أطاحت بحكم الرئيس
الأسبق زين العابدين بن علي، في كانون الثاني/يناير 2011، يشتعل الجدل من
جديد حول ما حققته الثورة، وما فشلت في تحقيقه عبر حكومات متعاقبة، تولت مقاليد الحكم على مدى السنوات الثماني الماضية، بينما تبدو التحركات الاجتماعية في تصاعد، ينذر بثورة جديدة من وجهة نظر البعض.
وبينما شهدت البلاد احتفالات بالذكرى الثامنة للثورة، تبدو تونس على موعد مع إضراب مزمع لموظفي القطاع العام، في السابع عشر من كانون الثاني يناير الجاري، كان قد أعلن عنه وتبناه الاتحاد التونسي للشغل، الذي يعد من أكبر النقابات العمالية في تونس والعالم العربي، احتجاجا على تردي أحوال التونسيين، وانخفاض قوتهم الشرائية على مدى السنوات الماضية.
وكان الأمين العام للاتحاد ، نور الدين الطبوبي، قد أكد في مؤتمر جماهيري، عقد في مقر اتحاد الشغل، احتفالا بذكرى الثورة الاثنين 14 كانون الثاني/ يناير ،المضي قدما في تنفيذ الإضراب، بعد فشل المحادثات مع الحكومة لزيادة الأجور، وقال الطبوبي: "إضرابنا متواصل، وليس هناك أي جلسة مبرمجة قبل الإضراب العام في القطاع العام المقرر ليوم 17 يناير الجاري".
ويغذي تنظيم هذا الإضراب بعد أيام فقط من الاحتفال بذكرى الثورة التونسية الجدل القائم في البلاد، مع حلول ذكرى الثورة، وهو ما الذي تحقق ؟ وما الذي لم يتحقق لصالح المواطن التونسي خلال هذه السنوات ؟
وينقسم التونسيون ونخبهم بهذا الشأن، فمنهم من يرى أن وضع تونس الآن أفضل من أيام حكم بن علي، خاصة على مستوى الحريات، ومنهم من يرى أن البلاد تئن خلال السنوات الثماني التي تلت الثورة، تحت واقع اقتصادي متردي فشلت في علاجه عدة حكومات متتالية.
ورغم الاختلاف بين تيارين، حول ما إذا كانت الأحوال في تونس أفضل بعد الثورة، إلا ان هناك اجماعا بين النخب التونسية على كافة انتماءاتها، على أن التخلص من حكم بن على، أحدث حالة غير مسبوقة من الانفراج في مجال الحريات، وأن المواطن التونسي يعيش منذ الثورة حالة من الحرية السياسية، لم يعرفها من قبل، ولا يعرفها أي مواطن عربي في الجوار الإقليمي، كما يتفق الجميع أيضا على أن هناك فشلا واضحا، على الجانب المقابل من قبل حكومات متتالية منذ الثورة، في إدارة الملف الاقتصادي للبلاد وهو ما أدى إلى الوضع الراهن، من بطالة مرتفعة وانخفاض في القوة الشرائية وزيادة في التضخم.
ويرى المؤيدون للثورة التونسية وكل ما تلاها، أن صمود الحالة التونسية في حد ذاته، في وقت فشلت فيه كل تجارب "الربيع العربي"، يعد انتصارا ، وهم يعتبرون أن قوى الثورة المضادة تكاتفت بكل قوة من أجل إفشال المرحلة الانتقالية التي تلت الثورة في تونس وأن ما تمر به تونس هو شيء طبيعي، في أعقاب كل الثورات، لكن المستقبل سيكون أفضل بكثير.
لكن القائلين بفشل الحكومات المتعاقبة التي تولت مقاليد الحكم منذ الثورة، في إدارة الملف الاقتصادي، يرون أن الإنسان لا يعيش بحرية التعبير فقط، وأنه في حاجة أولا إلى إشباع حاجاته الأساسية، وأن الحاصل حاليا في تونس يعيد الأمور إلى المربع الأول، حيث يؤجج الوضع المعيشي المتردي وانخفاض القدرة الشرائية من جديد الحركات الاحتجاجية، ويضع البلاد على مشارف ثورة جديدة.
أعادت قضية الفتاة السعودية رهف القنون، والهاربة من أسرتها من المملكة العربية السعودية، إلى الأضواء من جديد قضية الظروف التي تعيش فيها النساء السعوديات والتي ربما تكون استثناء، حتى في الدول العربية.
ووفقا للمعمول به في المملكة العربية السعودية فإن المرأة يتعين عليها أن تحصل على تصريح من أحد أقاربها الرجال للعمل، أو السفر، أو الزواج، أو حتى فتح حساب في البنك.
وكانت رهف قد فرت من عائلتها، التي كانت تمضي إجازة في الكويت المجاورة، ووفق ما تقول فإنها كانت تسعى إلى التوجه إلى أستراليا، عبر العاصمة التايلاندية بانكوك، حيث كانت تأمل في تقديم طلب لجوء للسلطات الأسترالية .
وقالت رهف ايضا، إن دبلوماسيا سعوديا التقاها، لدى هبوطها في المطار، حيث احتجز جواز سفرها السعودي وهي تؤكد أنها تحمل تأشيرة إلى استراليا ، وأنها لم تكن تريد أبدا البقاء في تايلاند.
وقد تحركت عدة هيئات أممية، وجماعات دولية لحقوق الإنسان، بجانب السلطات التايلاندية، لمعالجة قضية رهف، التي كانت قد تحصنت بغرفتها في أحد فنادق المطار، رافضة مغادرتها خشية إعادتها إلى الكويت، حيث قالت إن عائلتها ربما تقوم بقتلها، مشيرة إلى أنها لم تعد تعتنق الإسلام.
ومنحت السلطات التايلاندية رهف إقامة مؤقتة، في مكان غير معلوم، في حين أشارت تقارير إلى أن هيئة أممية مختصة بشؤون اللاجئين، ستبحث عن بلد يمنحها حق اللجوء في غضون خمسة أيام.
وفي أعادة للجدل بشأن نظام الولاية على المرأة في السعودية، طالبت ناشطات سعوديات عبر مواقع التواصل الاجتماعي، بإسقاط هذا النظام واعتبرنه قمعا للمرأة، وتحكما في حياتها ومصيرها، في ظل الانفتاح على العالم.
وتصدر هاشتاج #اسقطو_الولايه_ولا_كلنا_بنهاجر، قائمة اكثر الهاشتاغات انتشارا في السعودية حاصدا أكثر من عشرة آلاف تغريدة، عبرت من خلالها المغردات عن المعاناة التي تمر بها المرأة السعودية بسبب نظام الولاية.
وقد مثل تويتر خلال السنوات الأخيرة، متنفسا للمرأة السعودية للتعبير عن معاناتها، والتي رصدتها عدة هاشتاجات، عبرت ناشطات من خلالها عن المعاناة التي تواجهها المرأة السعودية، في مجال الحصول على فرصة عمل، والحصول على فرصة للابتعاث والدراسة في الخارج، في ظل ما يفرضه الوضع القائم من ضرورة حصولها على إذن، أو مرافقة محرم لها.
وكانت المرأة السعودية قد حصلت خلال العام الماضي لأول مرة، على حقها في قيادة السيارة، والذي ظلت محرومة منه لسنوات طويلة، في ظل حملة التغيير والانفتاح التي تم الترويج لها، في عهد ولي العهد السعودي محمد بن سلمان، غير أن ناشطات سعوديات يرين أن ذلك التطور وحده لا يعد كافيا، في ظل ما يقال عن عهد جديد من الانفتاح على العالم، وأن هناك قائمة طويلة من الحقوق ماتزال المرأة السعودية محرومة منها
وبينما شهدت البلاد احتفالات بالذكرى الثامنة للثورة، تبدو تونس على موعد مع إضراب مزمع لموظفي القطاع العام، في السابع عشر من كانون الثاني يناير الجاري، كان قد أعلن عنه وتبناه الاتحاد التونسي للشغل، الذي يعد من أكبر النقابات العمالية في تونس والعالم العربي، احتجاجا على تردي أحوال التونسيين، وانخفاض قوتهم الشرائية على مدى السنوات الماضية.
وكان الأمين العام للاتحاد ، نور الدين الطبوبي، قد أكد في مؤتمر جماهيري، عقد في مقر اتحاد الشغل، احتفالا بذكرى الثورة الاثنين 14 كانون الثاني/ يناير ،المضي قدما في تنفيذ الإضراب، بعد فشل المحادثات مع الحكومة لزيادة الأجور، وقال الطبوبي: "إضرابنا متواصل، وليس هناك أي جلسة مبرمجة قبل الإضراب العام في القطاع العام المقرر ليوم 17 يناير الجاري".
ويغذي تنظيم هذا الإضراب بعد أيام فقط من الاحتفال بذكرى الثورة التونسية الجدل القائم في البلاد، مع حلول ذكرى الثورة، وهو ما الذي تحقق ؟ وما الذي لم يتحقق لصالح المواطن التونسي خلال هذه السنوات ؟
وينقسم التونسيون ونخبهم بهذا الشأن، فمنهم من يرى أن وضع تونس الآن أفضل من أيام حكم بن علي، خاصة على مستوى الحريات، ومنهم من يرى أن البلاد تئن خلال السنوات الثماني التي تلت الثورة، تحت واقع اقتصادي متردي فشلت في علاجه عدة حكومات متتالية.
ورغم الاختلاف بين تيارين، حول ما إذا كانت الأحوال في تونس أفضل بعد الثورة، إلا ان هناك اجماعا بين النخب التونسية على كافة انتماءاتها، على أن التخلص من حكم بن على، أحدث حالة غير مسبوقة من الانفراج في مجال الحريات، وأن المواطن التونسي يعيش منذ الثورة حالة من الحرية السياسية، لم يعرفها من قبل، ولا يعرفها أي مواطن عربي في الجوار الإقليمي، كما يتفق الجميع أيضا على أن هناك فشلا واضحا، على الجانب المقابل من قبل حكومات متتالية منذ الثورة، في إدارة الملف الاقتصادي للبلاد وهو ما أدى إلى الوضع الراهن، من بطالة مرتفعة وانخفاض في القوة الشرائية وزيادة في التضخم.
ويرى المؤيدون للثورة التونسية وكل ما تلاها، أن صمود الحالة التونسية في حد ذاته، في وقت فشلت فيه كل تجارب "الربيع العربي"، يعد انتصارا ، وهم يعتبرون أن قوى الثورة المضادة تكاتفت بكل قوة من أجل إفشال المرحلة الانتقالية التي تلت الثورة في تونس وأن ما تمر به تونس هو شيء طبيعي، في أعقاب كل الثورات، لكن المستقبل سيكون أفضل بكثير.
لكن القائلين بفشل الحكومات المتعاقبة التي تولت مقاليد الحكم منذ الثورة، في إدارة الملف الاقتصادي، يرون أن الإنسان لا يعيش بحرية التعبير فقط، وأنه في حاجة أولا إلى إشباع حاجاته الأساسية، وأن الحاصل حاليا في تونس يعيد الأمور إلى المربع الأول، حيث يؤجج الوضع المعيشي المتردي وانخفاض القدرة الشرائية من جديد الحركات الاحتجاجية، ويضع البلاد على مشارف ثورة جديدة.
أعادت قضية الفتاة السعودية رهف القنون، والهاربة من أسرتها من المملكة العربية السعودية، إلى الأضواء من جديد قضية الظروف التي تعيش فيها النساء السعوديات والتي ربما تكون استثناء، حتى في الدول العربية.
ووفقا للمعمول به في المملكة العربية السعودية فإن المرأة يتعين عليها أن تحصل على تصريح من أحد أقاربها الرجال للعمل، أو السفر، أو الزواج، أو حتى فتح حساب في البنك.
وكانت رهف قد فرت من عائلتها، التي كانت تمضي إجازة في الكويت المجاورة، ووفق ما تقول فإنها كانت تسعى إلى التوجه إلى أستراليا، عبر العاصمة التايلاندية بانكوك، حيث كانت تأمل في تقديم طلب لجوء للسلطات الأسترالية .
وقالت رهف ايضا، إن دبلوماسيا سعوديا التقاها، لدى هبوطها في المطار، حيث احتجز جواز سفرها السعودي وهي تؤكد أنها تحمل تأشيرة إلى استراليا ، وأنها لم تكن تريد أبدا البقاء في تايلاند.
وقد تحركت عدة هيئات أممية، وجماعات دولية لحقوق الإنسان، بجانب السلطات التايلاندية، لمعالجة قضية رهف، التي كانت قد تحصنت بغرفتها في أحد فنادق المطار، رافضة مغادرتها خشية إعادتها إلى الكويت، حيث قالت إن عائلتها ربما تقوم بقتلها، مشيرة إلى أنها لم تعد تعتنق الإسلام.
ومنحت السلطات التايلاندية رهف إقامة مؤقتة، في مكان غير معلوم، في حين أشارت تقارير إلى أن هيئة أممية مختصة بشؤون اللاجئين، ستبحث عن بلد يمنحها حق اللجوء في غضون خمسة أيام.
وفي أعادة للجدل بشأن نظام الولاية على المرأة في السعودية، طالبت ناشطات سعوديات عبر مواقع التواصل الاجتماعي، بإسقاط هذا النظام واعتبرنه قمعا للمرأة، وتحكما في حياتها ومصيرها، في ظل الانفتاح على العالم.
وتصدر هاشتاج #اسقطو_الولايه_ولا_كلنا_بنهاجر، قائمة اكثر الهاشتاغات انتشارا في السعودية حاصدا أكثر من عشرة آلاف تغريدة، عبرت من خلالها المغردات عن المعاناة التي تمر بها المرأة السعودية بسبب نظام الولاية.
وقد مثل تويتر خلال السنوات الأخيرة، متنفسا للمرأة السعودية للتعبير عن معاناتها، والتي رصدتها عدة هاشتاجات، عبرت ناشطات من خلالها عن المعاناة التي تواجهها المرأة السعودية، في مجال الحصول على فرصة عمل، والحصول على فرصة للابتعاث والدراسة في الخارج، في ظل ما يفرضه الوضع القائم من ضرورة حصولها على إذن، أو مرافقة محرم لها.
وكانت المرأة السعودية قد حصلت خلال العام الماضي لأول مرة، على حقها في قيادة السيارة، والذي ظلت محرومة منه لسنوات طويلة، في ظل حملة التغيير والانفتاح التي تم الترويج لها، في عهد ولي العهد السعودي محمد بن سلمان، غير أن ناشطات سعوديات يرين أن ذلك التطور وحده لا يعد كافيا، في ظل ما يقال عن عهد جديد من الانفتاح على العالم، وأن هناك قائمة طويلة من الحقوق ماتزال المرأة السعودية محرومة منها
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